मांसाहार के पक्ष में निराधार दलीलें और मांसाहार को अन्तिम चुनौती



मांसाहार के पक्ष में निराधार दलीलें और मांसाहार को अन्तिम चुनौती

मुख्य रूप से मांसाहार के पक्ष में यह दलीलें दी जाती हैं - 

1. मांसाहार नहीं करेंगे, तो पशुओं की संख्या बहुत बढ़ जायेगी।
2. सभी शाकाहारी हो जायें, तो सबको भोजन नहीं मिल सकता।
3. जहाँ शाकाहार उपलब्ध नहीं होता, वहाँ मांसाहार करना पड़ता है।
4. कुछ स्थानों पर मांसाहार सस्ता पड़ता है।
5. मनुष्य को पशु-प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

हम दलील 5 को पहले ही निराधार सिद्ध कर चुके है, अब शेष दलीलों पर विचार करते हैं।

पशुओं की संख्या - 
यदि आप ईश्वर को मानते हैं, तो यह सृष्टि ईश्वर ने बनाई है और यदि ईश्वर को नहीं मानते, तो यह सृष्टि प्रकृति ने बनाई है। सृष्टि किसी डाॅक्टर, वैज्ञानिक, धर्मगुरु, अर्थशास्त्री या किसी राजनेता ने नहीं बनाई। ईश्वर या प्रकृति का ज्ञान व योजना किसी भी प्रकार के मानव से अधिक है, तो सृष्टि के सभी प्राणियों का सृष्टि में अपना स्थान व प्रयोजन है। उपयोग व प्रयोजन के अनुसार इनकी संख्या का संतुलन ईश्वर या प्रकृति के नियमानुसार अपने आप होता रहता है। मनुष्य को इसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को एक ही ध्यान रखना चाहिये कि वह ईश्वरीय या प्राकृतिक संतुलन को ना बिगाड़े। वैसे भी पृथ्वी पर मनुष्य सभी प्राणियों के बहुत बाद में आया है, तो मनुष्य के धरती पर आने से पहले पशुओं की संख्या का संतुलन कौन कर रहा था? वर्तमान में भी जिन स्थानों पर मनुष्य की पहुँच नहीं हैं, वहाँ संतुलन कौन कर रहा है? वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य मांसाहार द्वारा संतुलन बनाने के स्थान पर संतुलन बिगाड़ रहा है। 

शाकाहारी होने से भोजन की समस्या - 
यह तर्क निराधार है, वैसा दूसरा कोई नहीं। विश्व स्तर पर जितना खाद्यान्न उत्पादन होता है, उससे विश्व की डेढ़ से दोगुना जनसंख्या का पेट भर सकता है। भोजन की समस्या का असली कारण मांसाहार है। लगभग एक चैथाई जनसंख्या दो वक्त भरपेट भोजन नहीं कर पाती, इसका कारण मांसाहार है। विश्व स्तर पर कुल अनाज उत्पादन का 40 प्रतिशत मांस के लिए पशुओं को खिला दिया जाता है। अमेरिका जैसे देशों में तो यह 60 प्रतिशत तक है। सभी जानते हैं कि पशु भूसा खाकर जीवित रह सकता है, पर मनुष्य को भोजन भूसा नहीं, वरन, अनाज है। पशुओं में मांस के लिए अनाज खिला कर मनुष्य को भूखा मारना मांसाहार नहीं अपराध है। वास्तविकता तो यह है कि विश्व स्तर पर यदि 10 प्रतिशत मांसाहार कम कर दिया जाये, तो विश्व से भुखमरी समाप्त हो जाये। 

जहाँ शाकाहार उपलब्ध नहीं, वहाँ मांसाहार - 
यहाँ दो बातें हो सकती हैं। एक तो यह कि शाकाहार और मांसाहार में से किसी भी प्रकार का भोजन उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि भोजन बाहर से मंगवाना पड़ता है, तो शाकाहार का आयात आसान व सस्ता होगा, क्योंकि शाकाहारी भोजन मांस की तुलना में अधिक सुरक्षित है। दूसरी बात यह हो सकती है कि शाकाहार वहाँ पैदा ही नहीं होता हो। यदि यह तर्क दिया जाता है, तो यह तर्क निराधार होगा, क्योंकि जहाँ शाकाहारी भोजन पैदा नहीं होता, वहाँ मांस के लिये पशु-पक्षी कहाँ से आयेंगे? फिर भोजन आयात करना पड़ेगा। जहाँ शाकाहार का आयात सस्ता और सुरक्षित है, दूसरे स्थान से आहार आयात करके खाना पड़े, तो भी मांसाहार शाकाहार से महंगा और असुविधाजनक है।

कुछ स्थानों पर मांसाहार सस्ता पड़ता है - 
तटीय क्षेत्रों में जहाँ मछली मिल जाती है और पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़-बकरी का मांस प्रयोग किया जाता है, वहाँ यह तर्क मांसाहार के पक्ष में दिया जाता है। यहाँ विचारणीय बात यह है कि अकेली मछली या केवल भेड़-बकरी का मांस तो खाया नहीं जाता। मछली या मांस के साथ शाकाहार भी किया जाता है, तो हम ऐसे स्थानों पर भी शाकाहार पैदा कर सकते हैं। यह सिद्ध बात है कि जितने खाद्यान्न से (भूमि-पानी-अनाज) मांस पैदा किया जाता है, उससे कई गुणा कम खाद्यान्न में उतना ही शाकाहार पैदा किया जा सकता है। खाद्यान्न की दृष्टि से या कीमत की दृष्टि से देखें, तो मांसाहार शाकाहार के मुकाबले 4-5 गुणा महंगा पड़ता है, सस्ता बिल्कुल नहीं।

ये सब बातें भोजन के आर्थिक पक्ष से जुड़ी हुई हैं। यदि शारीरिक, सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, पर्यावरणीय पक्षों पर विचार करें, तो मांसाहार किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। इन सभी पहलुओं को देखते हुये मांसाहार उचित नहीं है। यदि फिर भी कोई मांसाहार को मनुष्य का भोजन कहे, तो उस व्यक्ति को (चाहे वो कोई भी हो) मेरी चुनौती का सामना करने का साहस होना चाहिए। पहले तो मेरे भोजन की परिभाषा का सामना करे। 

भोजन की मेरी परिभाषा - 
भोजन वह पदार्थ है, जिसे शरीर में डालने से शरीर जिन्दा रहता है। जिस पदार्थ को शरीर में डालने से शरीर जीवित न रह सके, वह भोजन नहीं कहला सकता है। यदि कोई मांस को मनुष्य का भोजन मानता है, तो उस व्यक्ति को मेरी चुनौती है कि वह केवल मांसाहार के सहारे तीन महीने जीवित रह कर दिखा दे, मैं मांस को मनुष्य का भोजन मानने में तैयार हो जाऊँगा। मनुष्य का भोजन शाकाहार होने से शाकाहार पर मनुष्य 90-100 वर्ष जीवित रहता है और शेर, चिता, तेंदुआ, भेड़िया आदि मांसाहारी मांस पर 10-12 वर्ष जीवित रहते हैं। नैतिकता और मनुष्यता का तकाजा यही है कि या तो चुनौती को स्वीकार करे, नहीं तो मांस को मनुष्य का भोजन कहना बन्द करें और मांसाहार से स्वयं परहेज करें और दूसरों को भी मांसाहार से बचायें।

✍️ डाॅ. भूपसिंह
रिटायर्ड एसोशिएट प्रोफेसर, भौतिक विज्ञान
भिवानी (हरियाणा)

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