*जिहाद: एक वैचारिक युद्ध*

 



● *जिहाद: एक वैचारिक युद्ध*

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर आतंकवाद से लड़ने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि किसी को आतंकवाद और हिंसा से लाभ नहीं हो सकता। उन्होंने फ्रांस में हमले की भी निंदा करते हुए स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद की लड़ाई में फ्रांस के साथ है। उन्होंने नीस के चर्च में हुए हमले का भी उल्लेख किया, जिसमें एक आदमी छुरा लेकर चर्च में घुसा और ‘अल्ला हो अकबर’ चिल्लाकर तीन लोगों को मार डाला था। प्रधानमंत्री ने भारत द्वारा झेले जाते रहे आतंकवाद का भी उल्लेख किया। जिसे आतंकवाद कहा जाता है, उसे खुद आतंकवादी ‘जिहाद’ कहते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस जिहादी आतंक का कारण इस्लामवाद और इस्लामी अलगाववाद को बताया है।

प्रश्न है कि जिस चीज के बारे में हमारे युवाओं को कभी कुछ बताया ही नहीं जाता, उससे लोग कैसे लड़ेंगे? किस चीज से सावधान रहेंगे? आजकल बीबीसी में अलकायदा पर एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई जा रही है। उसमें हम देख सकते हैं कि सीरिया के जिहादी कैंपों में वह कैसे छोटे-छोटे बच्चों को जिहाद, शरीयत की व्यवस्थित शिक्षा और काफिरों से लड़ने, हमले करने का हथियारबंद प्रशिक्षण देता रहा है। हालांकि इस मामले में वह कोई अपवाद नहीं है, बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नाइजीरिया आदि कई देश भी कट्टरपंथी युवाओं को किशोरवय से ही जिहाद का प्रशिक्षण देते रहे हैं। इसके अलावा हक्कानिया जैसे अनेक देवबंदी मदरसे दुनिया भर में ‘जिहाद फैक्ट्री’ के रूप में कुख्यात रहे हैं। उन सबके बारे में भारतीय छात्र, युवा कुछ नहीं जानते। उनकी संपूर्ण शिक्षा ऐसी होती है, मानों जिहाद से उनकी या देश की सुरक्षा कोई मुद्दा ही न हो!

ऐसे में प्रश्न है कि उस नियमित, कटिबद्ध जिहादी प्रशिक्षण की तुलना में उनके संभावित शिकारों, काफिरों की तैयारी क्या है? भारत तो दुनिया में जिहादी आतंकवाद से सबसे अधिक और निरंतर त्रस्त देशों में एक है। पिछले तीन दशक में ही भारत पर सैकड़ों आतंकी हमले हुए हैं, किंतु स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक कहीं ‘आतंकवाद’ या जिहाद’ के बारे में एक शब्द नहीं पढ़ाया जाता कि यह कौनसी चिड़िया है? उसके लक्ष्य, प्रेरणा, इतिहास आदि क्या हैं? साफ है कि दुश्मन से सही लड़ाई हो ही नहीं सकती, जब तक कि आप उसे पहचानते न हों।

दुश्मन का आत्मबोध और शत्रु-बोध, दोनों जानना उतना ही जरूरी है, जैसे डॉक्टर के लिए इलाज से पहले रोग की पहचान करना। यह इसलिए विशेष चिंताजनक है, क्योंकि जिहादी आतंकवाद मुख्यत: सैनिक लड़ाई नहीं है।

तभी अमेरिका और यूरोप अपने श्रेष्ठ हथियारों, सैनिकों के बाद भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान में आतंकवाद को नहीं हरा सके। उलटे किसी-न-किसी प्रकार उनसे समझौता करते रहे हैं, क्योंकि जिहाद मुख्यत: वैचारिक, शैक्षिक, लड़ाई है। खुद जिहादी किसी देश की सीमाओं पर नहीं, बल्कि समाज के अंदर रहते हैं। वहीं पनपते, फैलते हैं। अपना जाल फैलाते हैं और जब-तब हमले करते हैं। किनके ऊपर? प्राय: काफिर समाज पर यानी उनके बाजार, स्कूल, संसद, विधानसभा, मंदिर, चर्च और सिनॉगाग (यहूदी उपासना गृह) आदि पर। भारत में भी मंदिरों पर हमले होते रहे हैं, पर इनके शिकार हुए समाजों को कुछ नहीं मालूम कि जिहाद है क्या?

सवाल है कि हमारे युवा और आम नागरिक इस आतंकवाद से कैसे लड़ेंगे, जिसके बारे में उन्हें शिक्षा में कुछ ही नहीं बताया जाता। उनके माता-पिता की भी वही शिक्षा हुई, इसलिए वे भी खाली हैं। पत्रकार और नेतागण टूटी-फूटी बातें जानते हैं। तभी तो कहते हैं आतंकवाद से किसी को लाभ नहीं होता, जबकि सच्चाई यह है कि कम से कम एक मतवाद सारी दुनिया में केवल हिंसा और आतंक के बल पर फैला है। यही नहीं, कुछ दशकों से ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने पूरी दुनिया में काफिरों के बीच मिथ्या-प्रचार का व्यवस्थित तंत्र भी चला रखा है। इसमें वे आतंकवाद, जिहाद के बारे में भ्रामक बातें फैलाते हैं, ताकि उनके शिकार भ्रम में पड़े रहें। दुश्मन को भ्रमित करना सदैव युद्ध का एक अंग रहा है, अत: योजनाबद्ध जिहाद करने वाले संगठन इसके प्रति सचेत हैं, ताकि ‘काफिर’ लोग, उनकी सरकारें, बुद्धिजीवी, मीडिया आदि न केवल अनजान रहें, बल्कि उनका बचाव भी करें।

भारत से लेकर अमेरिका तक आम जनता शांति चाहती है। उनकी इसी भावना का फायदा उठाकर काफिरों को जिहाद की सच्चाइयों, अनुभवों, पूरे इतिहास पर पर्दा डालने को कहा जाता है, ताकि ‘शांति’ बनी रहे। इसी के पूरक कदम के रूप में इस्लामी नेता नाराजगी दिखाते हैं। जब भी कोई सच्चाई रखी जाती है, उसे ‘इस्लाम को बदनाम’ करना कहकर धमकी देकर बंद कराया जाता है, जबकि वही बातें खुलकर सारे आतंकवादी ठसक से कहते हैं। उनके पर्चों, पोथियों, प्रशिक्षण वीडियो में, हर कहीं इस्लामी किताबों की ही बातें दुहराई मिलती हैं, लेकिन उसी पर विचार-विमर्श करने पर नाराजगी दिखाकर आपत्ति की जाती है। जैसे अभी फ्रांसीसी राष्ट्रपति पर हो रहा है। मैक्रों ने जिस इस्लामवाद और अलगाववाद का उल्लेख किया है, वह स्वत: प्रमाणित है।

काफिर से अलगाव के बिना इस्लामी सिद्धांत का एक पैराग्राफ भी नहीं बनता। आखिर फ्रांस के राष्ट्रीय कानूनों के बदले शरीयत, फ्रांसीसी शिक्षा के बदले अरब जाकर मदरसे की शिक्षा लेने, सारे जिहादियों द्वारा कुरान और शरीयत का हवाला देना आदि अलगाववाद और इस्लामवाद नहीं तो और क्या है? फिर जिहाद का पूरा सिद्धांत कुरान और सुन्ना (प्रोफेट के कथन एवं व्यवहार) के सिवा और कहीं पर वर्णित नहीं है। सारे जिहादी संगठन वही पढ़ते, पढ़ाते हैं। कथित ‘व्याख्या की गलतफहमी’ भी तभी दूर होगी, जब पहले उसे सामने रखें। इसलिए सभी देशों की सरकारें आतंकियों के सिद्धांत, विचारों, पर्चों, किताबों और प्रशिक्षण दस्तावेजों के व्यवस्थित अध्ययन की व्यवस्था करें या करवाएं, जैसे गणित या भौतिकी का वैज्ञानिक अध्ययन होता है। राष्ट्रीय एवं आंतरिक सुरक्षा ऐसा उपेक्षणीय विषय तो नहीं, जिसके प्रति सुनी-सुनाई बातों पर हम निर्भर रहें! भारत की भी शिक्षा योजना में इतिहास, धर्म और राष्ट्रीय एवं आंतरिक सुरक्षा का उल्लेख तक गायब हो गया है। यह नि:संदेह आतंकवादियों को ही सुविधा देता है। ज्ञात रहे कि दुश्मन के बारे में प्रमाणिक जानकारी होने और उसके द्वारा हमले की संख्या में प्रतिकूल आनुपातिक संबंध है।

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~ डॉ. शंकर शरण (१८ नवम्बर २०२०)

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