• वेद - नास्तिकों के लिए भी उपयोगी

 • वेद - नास्तिकों के लिए भी उपयोगी

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- पंडित क्षितीश कुमार वेदालंकार 


जो धर्म को मनुष्य जाति के लिए अफीम बताते हैं उनकी किसी भी धर्मग्रन्थ में आस्था नहीं। ईश्वर में ही आस्था नहीं तो धर्म या धर्मग्रन्थ को लेकर क्या होगा ?


परन्तु अब हम कहते हैं कि वेद नास्तिकों और धर्म विरोधियों के लिए भी उतना ही उपयोगी है जितना धर्मप्रेमियों के लिए। नास्तिक लोग भी विज्ञान और विज्ञानेतर विषयों की पुस्तकें तो पढ़ते ही हैं। हम कहते हैं कि वेद केवल धर्मग्रन्थ नहीं है, वह विज्ञान और विज्ञानेतर विषयों का भी अगाध भण्डार है। वह समस्त सत्य विद्याओं का आगार है। मानव जीवन के लिए जो भी कुछ उपयोगी है, उस सबका निदर्शन वेद के अन्दर है। 


अन्य धर्मग्रन्थों में से उन मतों के प्रवर्तकों का जीवन-वृत्त निकाल दीजिए, उनके समय के इतिहास और भूगोल का विवेचन निकाल दीजिए, उन महान् पुरुषों के जीवन के साथ दन्तकथाओं के रूप में जुड़े आख्यानों को निकाल दीजिए, सामाजिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में देश-काल और परिस्थिति के अनुसार दी गई व्यवस्थाओं को निकाल दीजिए, तो आप देखेंगे कि उन धर्मग्रन्थों में इसके बाद जो कुछ बचता है वह नगण्य है, या ऐसा कुछ है जिसे उससे पूर्ववर्ती धर्मग्रन्थ कह चुके हैं। धर्मग्रन्थों की इन्हीं व्यक्तिवादिताओं और दुर्बलताओं को देखकर तो अधर्मियों को उनसे अश्रद्धा हुई है। 


परन्तु वेद में किसी व्यक्ति विशेष का या देश-विशेष का या काल-विशेष का इतिहास नहीं, वहां तो शाश्वत इतिहास है। अन्य मत मतान्तरों में से उन मतों के प्रवर्तकों को निकाल दें तो वे मत धराशायी हो जाते हैं क्योंकि वे अपने पैगम्बरों के बिना नहीं टिक सकते, परन्तु वेद के साथ ऐसी बात नहीं। किसी भी व्यक्ति को निकाल देने से वेद का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि वह व्यक्ति पर आधारित नहीं है। वेद समस्त मनुष्य जाति के लिए है। सच तो यह है कि वेद व्यक्तिपरक है ही नहीं, वह तो ज्ञानपरक ही है। वेद शब्द का अर्थ भी सिवाय ज्ञान के और कुछ नहीं है। सांसारिक ज्ञान की पुस्तकों में केवल ऐहिक ज्ञान का विवेचन होगा, परन्तु वेद में ऐहिक के साथ पारलौकिक ज्ञान, भौतिक के साथ आध्यात्मिक ज्ञान और अभ्युदय के साथ निःश्रेयस का भी विवेचन है ।


यदि मानव जीवन के लिए वेद की इतनी उपयोगिता न होती तो भारत के ब्राह्मणों ने अपने प्राण देकर भी उनकी रक्षा का प्रयत्न न किया होता, वेदों को कंठाग्र करना अपने जीवन का लक्ष्य न बनाया होता और "ब्राह्मणेन निष्कारणो षडङ्गो वेदोऽध्येयः" के नियम के अनुसार बिना किसी भौतिक लाभ की आशा के वेदों के पठन-पाठन में ही अपना समस्त जीवन न लगाया होता। न ही चतुर्वेदी, त्रिवेदी या द्विवेदी की वंशपरम्परा चली होती। न ही भारतवर्ष ने अतीतकाल में ज्ञान-विज्ञान में इतनी उन्नति की होती। न ही आज भी देश-विदेश के विद्वानों ने इतनी बड़ी संख्या में वेद के स्वाध्याय में अपना जीवन खपाया होता।


जैसे हिमालय का सर्वोच्च शिखर मानवात्मा को चुनौती देता है, जैसे महासागर की गहराइयां वैज्ञानिकों का आह्वान करती हैं, जैसे मंगल और चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रह किसी साहसी अन्तरिक्ष यात्री की प्रतीक्षा करते हैं, और मानव की चिर-जिज्ञासु आत्मा उस चुनौती को स्वीकार कर अज्ञात के अनन्त रहस्यों को खोजने के लिए अपने विजय-पथ पर निकल पड़ती है। वैसे ही क्या ज्ञान का यह सर्वोच्च शिखर, ज्ञान का यह महासागर, ज्ञान का यह सूर्य - वेद भी मानव की बुद्धि और परिश्रम के लिए चुनौती नहीं है ? किसी नास्तिक के लिए भी इस अज्ञात को सुज्ञात बना देने से बढ़कर जीवन की कृतकार्यता और क्या हो सकती है ? ज्ञान का भण्डार वेद ज्ञान के नए आयाम अपने वक्ष में छिपाए साहसी व्यक्तियों की प्रतीक्षा में है।


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[स्रोत : "आर्योदय" हिंदी साप्ताहिक का 20 मार्च 1966 को प्रकाशित वेदांक विशेषांक, पृ. 13-14, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]

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